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फूलों की वैज्ञानिक खेती

फूलों की खेती हम अपने घर और आस पास के वातावरण को सजाने महकाने के लिये भी कर सकते हैं और व्यवसायिकयिक उद्देश्यसे धन कमाने के  लिये भी कर सकते हैं.
सादर

सब्ज़ियों की खेती की उन्नत कार्यमाला

सब्ज़ियों की खेती किसान परिवार के लिये कम समय में तथा लगातार आने वाली आय का सुनिश्चित स्त्रोत रहा है साथ ही साथ यह परिवार के लिये पौष्टिक आहार प्रदाय करने वाला स्त्रोत भी रहा है एवं प्रत्येक परिवार अपने खेत अथवा बाड़े में सबज़ियों की खेती अवश्य करते हैं जिससे वे एक ही फसल पर निर्भर रहने के जोखिम को कम भी करते हैं 
सबज़ियों की देख-भाल की समुचित जानकारी किसान भाई बहनों की सदैव से अवशयकता रही है.  यहाँ प्रस्तुत कार्यमाला इस समस्या दूर कर देगी ऐसा विश्वास है. किसान भाई बहन इस कार्यमाला का प्रिंट भी निकलवा कर अपने पास रख सकते हैं तथा और भाई बहन को भी पढ़ने को दे सकते हैं तथा सहायता सकते हैं. 
अधिक जानकारी की लिये निम्नलिखित वैज्ञानिकों से दोपहर 3.00 से 5.00 के मध्य, रविवार, दूसरा और तीसरा शनिवार तथा शासकीय छुट्टियों के दिन छोड़कर सम्पर्क करें-
1. डॉ. राजेश सिंह : 9424620540
2. डॉ. आर.एल. राऊत - 9425896702
3. डॉ. बृजपाल बिसेन - 9424550473
सादर 

फलों की कर्यमाला

फलों की खेती किसान परिवार के लिये सदा से एक सुनिश्चित आय का स्त्रोत रहा है. न केवल आय बल्कि घर परिवार के लिय यह पौष्टिक आहार प्रदाय करने वाला स्त्रोत भी रहा है एवं प्रत्येक परिवार अपने खेत अथवा बाड़े में कुछ फलदार पेड़ अवश्य लगाते हैं 
किंतु यह देखा गया है इन पौधों या पेड़ों की देख-भाल की समुचित जानकारी के आभाव में किसान भाई फल की अच्छी फसल  नहीं ले पाते हैं. किंतु यहाँ प्रस्तुत कार्यमाला यह समस्या दूर कर देगी ऐसा विश्वास है. 
अधिक जानकारी की लिये निम्नलिखित वैज्ञानिकों से दोपहर 3.00 से 5.00 के मध्य, रविवार, दूसरा और तीसरा शनिवार तथा शासकीय छुट्टियों के दिन छोड़कर सम्पर्क करें-
1. डॉ. राजेश सिंह : 9424620540
2. डॉ. आर.एल. राऊत - 9425896702
3. डॉ. बृजपाल बिसेन - 9424550473
 सादर 

अमरूद की उन्नत काश्त

अमरूद भारत का एक लोकप्रिय फल है। क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से देश में उगाये जाने वाले फलों में अमरूद का चौथा स्थान है। यह विटामिन-सी का मुख्य स्त्रोत है। यह असिंचित एंव सिंचित क्षेत्रों में सभी प्रकार की ज़मीन में उगाया जा सकता है।
भूमि एवं जलवायु:     
अमरूद को लगभग प्रत्येक प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है, परन्तु अच्छे उत्पादन के लिये उपजाऊ बलुई दुमट भूमि अच्छी पाई गई है। इसके उत्पादन हेतु 6 से 7.5 पी.एच. मान की मृदा उपयुक्त होती है किन्तु 7.5 से अधिक पी.एच. मान की मृदा में उकठा रोग के प्रकोप की संभावना होती है। अमरूद को उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु में सफलता पूर्वक पैदा किया जा सकता है, परन्तु अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, अमरूद की खेती के लिये उपयुक्त नहीं होते हैं। अमरूद की खेती के लिये 15 डिग्री. से. 30 डिग्री से. तापमान अनुकूल होता है। यह सूखे को भी भली-भाँति सहन कर लेता है। तापमान के अधिक उतार चढ़ाव, गर्म हवा, कम वर्षा, जलक्रान्ति का फलोत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव कम पड़ता है। अमरूद को मध्यप्रदेश के सभी जि़लों में उगाया जा सकता है ।
उन्नत किस्में:    
अमरूद की व्यावयायिक स्तर पर उगाई जाने वाली किस्मों में से इलाहाबाद सफेदा, लखनऊ-49, चित्तीदार, ग्वालियर-27, एपिल-गुवावा एवं धारीदार प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त अर्का-मृदुला, श्वेता, ललित एवं पंत-प्रभात किस्में व्यवसायिक उत्पादन हेतु उपयोग में लाई जा सकती हैं। कोहीर, सफेदा एवं सफेद जाम नामक संकर प्रजातियाँ भी उपयोग में लाई जा सकती हैं।
इलाहाबाद-सफेदा:
इस किस्म के पेड़ सीधे बढ़ने वाले एवं मध्यम ऊँचाई वाले होते हैं । फल का आकार मध्यम, गोलाकार एंव औसत वजन 180 ग्राम होता है। फल की सतह चिकनी, छिल्का पीला, गूदा मुलायम, रंग सफेद, सुविकसित और स्वाद मीठा होता है। बीज बड़े एवं कड़े होते हैं। इस किस्म की भंडारण क्षमता अच्छी होती है।
लखनऊ-49 (सरदार अमरूद):
इस किस्म के पेड़ मध्यम ऊँचाई के, फलने वाले तथा अधिक शाखाओं वाले होते हैं। फल मध्यम से बडे़, गोल, अंडाकार, खुरदुरी सतह वाले एवं पीले रंग के होते हैं। गूदा मूलायम, सफेद तथा स्वाद खटास लिये हुये मीठा होता है। इसकी भंडारण क्षमता अन्य जातियों की तुलना में अच्छी होती है तथा इसमें उकठा रोग का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है।
चित्तीदार:
यह किस्म सफेदा के समान होती है। परन्तु फलों की सतह पर लाल रंग के धब्बे पाये जाते हैं। इसके बीज मुलायम तथा छोटे होते हैं । फल मध्यम, अंडाकार, चिकने एवं हल्के पीले रंग के होते हैं। गूदा मुलायम, सफेद, सुवास युक्त मीठा होता है।
एप्पल-कलर:
इस किस्म के भी पौधे मध्यम ऊँचाई के एवं फैले हुये होते हैं। फल गोल एवं चिकने होते हैं। छिल्का गुलाबी या हरे लाल रंग का होता है। फलों का गूदा मुलायम, सफेद एवं सुवास युक्त होता है। बीज मध्यम आकार के होते हैं तथा फलों की भंडारण क्षमता मध्यम होती है।
 अर्का-मृदुला:
यह जाति इलाहाबाद सफेदा से पौधे चुनाव विधि के द्वारा विकसित की गई है। फल चिकने, मध्यम आकार, मुलायम बीज, गूदा सफेद एवं मीठा होता है। इस किस्म में प्रचुर मात्रा में विटामिन-सी पाई जाती है। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है।
ललित:
यह किस्म सी.आई.एस.एच. लखनऊ द्वारा विकसित की गई है। फल मध्यम आकार एवं केशरनुमा आकर्षक पीले रंग के होते हैं। गूदा गुलाबी रंग का होता है। जिसके कारण यह किस्म संरक्षित पदार्थों को बनाने हेतु उपयुक्त होती है। यह किस्म इलाहाबाद सफेदा की अपेक्षा 24 प्रतिशत तक अधिक उत्पादन देती है। फल का वजन 250 से 300 ग्राम तक होता है ।
संकर जातियाँ
अमरूद की संकर जातियाँ इस प्रकार हैं:
अर्का-अमूल्या:
यह जाति सीडलेस एंव इलाहाबाद सफेदा के संकरण से तैयार की गई है। इसके वृक्ष मध्यम आकार के एवं अधिक उत्पादन देने वाले होते हैं। फल मध्यम आकार (180-200 ग्राम), सफेद रंग, गूदा मीठा, मुलायम एवं बीज छोटे होते हैं। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है।
प्रसारण तथा प्रवर्धन:
अमरूद का प्रसार व्यवसायिक स्तर पर वानस्पतिक विधियों द्वारा किया जा सकता है अतः अमरूद का बाग लगाने के लिये वानस्पतिक विधियों द्वारा तैयार पौधों का ही उपयोग करें। इसके व्यावसायिक प्रसार के लिये पेंच कलिकायन एवं उपरोपण विधि का उपयोग किया जाना उत्तम पाया गया है ।
पादप रोपणः
पादप रोपण द्वारा अमरूद के पौधे लगाने का मुख्य समय जुलाई से अगस्त तक है लेकिन जिन स्थानों में सिंचाई की सुविधा हो वहाँ पर पौधे फरवरी-मार्च में भी लगाये जा सकते हैं। बाग लगाने के लिये खेत को समतल करने के पश्चात् रेखांकन कर पौधे लगाने के लिये निश्चित दूरी पर 60 सें.मी X 60 सें.मी. X 60 सें.मी. आकार के गड्ढे तैयार करें। इन गड्ढों को 15-20 कि.ग्रा. अच्छी तैयार हुई गोबर की खाद, 500 ग्राम सुपर फॉस्फेट, 250 ग्राम पोटाश तथा 100 ग्राम मिथाईल पैराथियॉन पाऊडर को अच्छी तरह से मिट्टी में मिला कर पौधे लगाने के 15-20 दिन पहले भर दें। बाग में पौधे लगाने की दूरी मृदा की उर्वरता, किस्म विशेष एवं जलवायु पर निर्भर करती है। इस प्रकार कम उपजाऊ भूमि में 6 मी. X 6 मी. एवं 6.5 मी. X 6.5 मी. की दूरी पर पौधे लगायें।               
सघन बागवानी/रोपण:    
अमरूद की सघन बागवानी के बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त हुये हैं। सघन रोपण में प्रति हैक्टेयर 500 से 5000 पौधे तक लगाये जा सकते हैं तथा समय-समय पर कटाई-छँटाई करके एवं वृद्धि नियंत्रकों का प्रयोग करके पौधों का आकार छोटा रखा जाता है। इस तरह की बागवानी से 30 टन से 50 टन तक उत्पादन/है. लिया जा सकता है। जबकि पारम्परिक विधि से लगाये गये बगीचों का उत्पादन 15-20 टन/है. होता है।
(अ) 3 मीटर (पंक्ति से पंक्ति) 1.5 मीटर (पौधे से पौधे) कुल 2222 पौधे/हैक्टेयर।
(ब) 3 मीटर (पंक्ति से पंक्ति) 3 मीटर (पौधे से पौधे) कुल 1111 पौधे/हैक्टेयर।
(स) 6 मीटर (पंक्ति से पंक्ति) 1.5 मीटर (पौधे से पौधे) कुल 555 पौधे/हैक्टेयर।
 खाद एवं उर्वरक:
अमरूद की संतोषजनक वृद्धि एवं उत्पादन के लिये पर्याप्त मात्रा में खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है। अमरूद को मुख्य एवं सूक्ष्म तत्वों की आवश्यकता होती है जिनमें नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश युक्त तत्वों की काफी मात्रा में आवश्यकता होती है। जस्ते एवं बोरॉन  तत्वों की कम मात्रा में अवश्यकता पड़ती है। अमरूद के कुछ बागों/पौधों में जस्ते की कमी देखी गई है। इसकी कमी से पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है, बहुत सी छोटी व नुकीली पत्तियाँ गुच्छों के रूप में निकलती हैं और पत्तियों के नसों का रंग हल्का पीला हो जाता है। बहुत अधिक कमी होने पर पेड़ों की शाखायें ऊपर की तरफ से सूखना प्रारंभ कर देती हैं । पौधों में फूल कम आते हैं एवं जो फल लगते हैं, फटकर सूख जाते हैं। बोरॉन  की कमी से फलों के अन्दर, बीजों के पास एक धब्बा बन जाता है जो गूदे की तरफ बढ़ कर गूदे को भूरे या काले रंग का कर देता है जिससे प्रभावित भाग कड़ा हो जाता है तथा फलों का आकार छोटा हो जाता है। अतः पौधों की उत्तम वृद्धि एवं उत्पादन के लिये खाद एवं उर्वरकों की निम्नलिखित मात्रा का प्रयोग करें -
अमरूद के लिये खाद एवं उर्वरक की मात्रा
क्र.
पौधों की आयु (वर्षों में)
गोबर खाद
(कि.ग्रा.)
नत्रजन
(ग्राम)
स्फुर
(ग्राम)
पोटाश
(ग्राम)
1.       
1
10
50
30
50
2.       
2
20
100
60
100
3.       
3
30
150
90
150
4.       
4
40
200
120
200
5.       
5
50
250
150
250
6.       
6 वर्ष एवं ऊपर
60
300
180
300

उपरोक्त खाद एवं उर्वरकों के अतिरिक्त 0.5 प्रतिशत ज़िंक सल्फेट, 0.4 प्रतिशत बोरिक ऐसिड एवं 0.4 प्रतिशत कॉपर  सल्फेट का छिड़काव फूल आने के पहले करने से पौधों की वृद्धि एवं उत्पादन बढ़ाने में सफलता मिलेगी।
जैविक खाद:
अमरूद में नीम की खली 6 कि.ग्रा. प्रति पौधा डालने से उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उत्तम गुण वाले फल प्राप्त करें। गोबर की खाद 40 कि.ग्रा. अथवा 4 कि.ग्रा. वर्मी कम्पोस्ट के साथ 100 ग्राम जैविक खाद जैसे एज़ोस्पाईरिलम, व्ही.ए.एम. एवं पी.एस.एम. के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि एवं अच्छी गुणवत्ता वाले फलों का  उत्पादन होगा।
खाद देने का समय एवं विधि:
अमरूद में पोषक तत्व खींचने वाली जड़ें तने के आस-पास एवं 30 सें.मी. की गहराई में होती है। इसलिये खाद देते समय इस बात का ध्यान रखें कि खाद, पेड़ के फैलाव में 15-20 सें.मी. की गहराई में थाला बनाकर दें । गोबर की खाद, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा जून-जुलाई में तथा शेष नत्रजन की मात्रा सितम्बर-अक्टूबर में वर्षा समाप्त होने से पहले दें।
सिंचाई:
अमरूद के एक से दो वर्ष पुराने पौधों की सिंचाई, भारी भूमि में 10-15 दिन के अन्तर से तथा हल्की भूमि में 5-7 दिन के अन्तर से करें। गर्मियों में सिंचाई का अंतराल कम करें व सिंचाई जल्दी-जल्दी करें। दो वर्ष से अधिक उम्र के पौधों को भारी भूमि में 20 दिन तथा हल्की भूमि में 10 दिन के अन्तर से थाला बनाकर पानी दें। पुराने एवं फलदार पेड़ों की सिंचाई, वर्षा के बाद 20-25 दिन के अंतर से, जब तक फसल बढ़ती है, करते रहें तथा फसल तोड़ने के बाद सिंचाई बंद कर दें।
मल्चिंग/बिछावन:
असिंचित क्षेत्रों में वर्षा के जल को अमरूद के पौधो के चारों ओर थाला बना कर सिंचित करें तथा सितम्बर माह में घास एवं पत्तियाँ बिछा कर नमी को संरक्षित करें। इससे उत्पादन में वृद्धि होकर उत्तम गुण वाले फल प्राप्त होंगे ।
कटाई-छँटाईः
प्रारंभिक वर्ष में कटाई-छँटाई का कार्य कर पौधों को आकार दें। पौधों को साधने के लिये सबसे पहले उन्हें 60-90 सें.मी. तक सीधा बढ़ने दें। फिर इस ऊँचाई के बाद 15-20 से.मी. के अंतर पर 3-4 शाखायें चुन लें। इसके पश्चात् मुख्य तने के शीर्ष  एवं किनारे की शाखाओं की कटाई एवं छँटाई करें जिससे पेड़ का आकार नियंत्रित रहे। बड़े पेड़ों से सूखी तथा रोगग्रस्त टहनियों को अलग करें। तने के आस-पास भूमि की सतह से निकलने वाले कल्लों को निकालते रहें। पुराने पौधे जिनकी उत्पादन क्षमता घट गई हो उनकी मुख्य एवं द्वितीयक शाखाओं की कटाई करें जिससे नई शाखायें आयेंगी तथा पुराने पौधों की उत्पादन क्षमता बढे़गी।
अन्तरवर्तीय फसलें:
प्रारंभिक दो-तीन वर्षों में बगीचों के रिक्त स्थानों में रबी में मटर,फ्रैंचबीन, गोभी एवं मेथी, खरीफ में लोबिया, ज्वार, उर्द, मूँग एवं सोयाबीन तथा ज़ायद (गर्मी की फसल) में कद्दू वर्गीय सब्ज़ियाँ उगायें।
फलन उपचार (बहार ट्रीटमैंट):
अमरूद में आमतौर पर वर्ष में एक मुख्य शीतकालीन फसल (हस्त बहार) लेने का सुझाव दिया जाता है जबकि अमरूद में वर्ष में तीन बार फूल आते हैं । अतः गर्मी एवं वर्षा ऋतु में आने वाले फूलों को सिंचाई रोककर प्रतिबंधित करना उचित होता है। वर्षाकालीन फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप अधिक होता है। जबकि सर्दी की फसल के फल उत्तम गुण वाले होते हैं तथा फलों में विटामिन-सी की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती है। वर्षाकालीन फसल को बाज़ार में अच्छा मूल्य नहीं मिल पाता है। अतः ठंड की फसल लेने की सिफारिश की जाती है। वर्षाकालीन फसल को रोक कर ठंड की फसल लेने के लिये निम्नलिखित उपाय करें -       
1.      अप्रैल से जून तक पौधों को पानी नहीं दें। पानी रोकने की यह क्रिया 4 वर्ष से अधिक उम्र के पौधों में ही करें। जिससे बसंत ऋतु में फूल एवं पत्तियाँ गिर जाती हैं तथा वर्षान्त में फूल काफी संख्या में आते हैं। इस कार्य हेतु स्थानीय अनुभव अनुसार पानी रोकने की समय सीमा तय करे।
2.      यूरिया का 10 प्रतिशत घोल का छिड़काव एक बार या 100-200 पी.पी.एम नेफ्थलीन ऐसेटिक एसिड के घोल का छिड़काव 20 दिन के अंतराल से दो बार करें । जिससे अनचाहे फल/पत्तियाँ गिराये जा सकते हैं ।
रोग नियंत्रण
यद्यपि अमरूद में कई प्रकार के रोग बीमारियाँ जैसे उकठा, एन्थ्रेक्नोज़, पौध अंगमारी, तना कैन्कर, फल चित्ती एवं स्कैब आदि से नुकसान होता है लेकिन सर्वाधिक नुकसान उकठा से होता हैं। अमरूद के पेड़ को प्रभावित करने वाले रोग एवं उनके नियंत्रण निम्नानुसार है -
उकठा:
यह अमरूद का सबसे विनाशकारी रोग है। इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम वर्षांत में दिखाई देते हैं। रोगी पेड़ों की पत्तियाँ भूरे रंग की होती हैं एवं पेड़ मुरझा जाता है। प्रभावित पेड़ों की डालियाँ एक-एक करके सूखने लगती हैं। यह रोग उन क्षेत्रों में अधिक तीव्र गति से फैलता है जहाँ कि मृदा का पी.एच. मान 7.5 से अधिक होता है। भूमि की नमी भी रोग को फैलने में सहायक होती है। मृदा आर्द्रता (60-80 प्रतिशत) पर रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। यह रोग लाल लैटराईट एवं एल्यूवियल भूमि में तीव्रता से फैलता है।
नियंत्रण:
इस रोग से ग्रसित पौधों / पेड़ों के गड्ढों की मिट्टी को एक ग्राम बेनलेट या कार्बेन्डाज़िम प्रति लीटर पानी में घोल कर (20 लीटर प्रति गड्ढा) उपचारित करें। भूमि में चूना, जिप्सम तथा कार्बनिक खाद मिलाकर रोग के प्रकोप को कम करें। अमरूद की लखनऊ-49 किस्म में यह रोग कम लगता है। अतः इस जाति का प्रयोग करें। चायनीज़ जाति के अमरूद इस रोग से काफी हद तक प्रतिरोधी पाये गये हैं। अतः इसे मूलवृन्त के रूप में प्रयोग करें।
कीट नियंत्रण
अमरूद में तना छेदक, फल की मक्खी, मिली बग, स्केल कीट आदि से नुकसान होता है। अमरूद के पेड़ को प्रभावित करने वाले कीट एवं उनके नियंत्रण निम्नानुसार हैं -
छाल भक्षक इल्ली:
अमरूद में सबसे ज्यादा नुकसान इस इल्ली के द्वारा होता है, जो कि अमरूद के अतिरिक्त आम, बेर, अनार तथा नींबू जाति के फलों पर भी आक्रमण करती है। इस कीट की इल्ली तने का छाल खाती है तथा तने में छेद कर देती है। छाल खाने के बाद एक प्रकार का काला अवशेष छोड़ती है जो कि प्रभावित हिस्सों पर चिपका रहता है।
नियंत्रण:
इसकी रोकथाम के लिये छिद्रों में मिट्टी के तेल या पेट्रोल या न्यूवॉन  से भीगी रूई छेद में डालें एवं ऊपर से छेद के मुँह को गीली मिट्टी से बन्द कर दें।

आम की उन्नत काश्त

भारतवर्ष का सर्वसुलभ एवं लगभग प्रत्येक प्रान्त में सरलता से उगाया जा सकने वाला फल आम है। इसके स्वाद, सुगन्ध एवं रंग-रूप के कारण इसे फलों का राजा कहा जाता है। आम के पके हुये फल स्वादिष्ट, पौष्टिक एवं स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। ताजे़ पके फल के उपयोग के अतिरिक्त आम के फलों से अनेक परिरक्षित पदार्थ बनाये जाते हैं, जैसे - कच्चे फलों से अचार, अमचूर तथा पके फलो से स्क्वैश, जूस, शर्बत, जैम, अमावट आदि। अधिकतम आय के लिये आम के बागीचे वैज्ञानिक तकनीकी के प्रयोग से करें.
मृदा एवं जलवायु:
आम की फसल की बागवानी के लिये अच्छी जलधारण क्षमता वाली गहरी, बलुई, दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। गहरी काली मिट्टी इसके लिये अनुपयुक्त होती है । भूमि का पी. एच. मान 5.5 से 7.5 होना चाहिये तथा गहराई कम से कम 1 से 1.5 मीटर होनी चाहिये।
            आम उष्ण जलवायु वाला पौधा है। यह सरलतापूर्वक समुद्र सतह से 1100 मी. तक की ऊँचाई पर उगाया जा सकता है। आम के लिये 24 से.ग्रे. से 37 से.ग्रे. का तापमान अच्छा होता है। फूल आने के समय अधिक आर्दता, वर्षा एवं पाला, आम के लिये उपयुक्त नहीं है। फल वृद्धि के समय अधिक तापक्रम फल की गुणवत्ता के लिये अच्छा होता है।
उन्नत किस्में:
आम की लगभग 1000 से अधिक किस्में उगाई जाती हैं किन्तु व्यापारिक दृष्टिकोण से 40-50 किस्में उपयुक्त है। कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं-
1. आम्रपाली (दशहरी -  नीलम):
यह एक संकर किस्म है जिसके पौधे बौने होते हैं एवं यह किस्म सघन बागवानी के लिये उपयुक्त है। इसके फल, आकार में छोटे होते हैं परन्तु प्रतिवर्ष फलते हैं। यह देर से पकने वाली किस्म है जिसमें फल जून के अंत में पकते हैं। सघन बागवानी में इससे 200 - 250 क्विंटल/हैक्टेयर उपज प्राप्त होती है।
2. मल्लिका (नीलम -  दशहरी):
यह एक संकर किस्म है जिसके फल बहुत बड़े (औसत वजन 500 ग्राम) होते हैं। फल का रंग गुलाबी-पीला, गुठली गूदेदार, मीठा एवं स्वादिष्ट होता है। यह नियमित रूप से फलने वाली किस्म है। इस किस्म की भंडारण क्षमता अधिक होती है यह किस्म खाने एवं प्रसंस्करण हेतु उपयुक्त है। एक संपूर्ण विकसित वृक्ष से औसतन 150-200 किलो ग्राम फल प्राप्त होते हैं।
3.  दशहरी:
इस किस्म का उत्पत्ति स्थान लखनऊ है एवं यह उत्तर भारत की प्रमुख एवं स्वाद हेतु लोकप्रिय किस्म है। यह मध्य जून से जुलाई तक पकने वाली किस्म है। वृक्ष मध्यम ऊँचाई का फैलने वाला तथा शीर्ष गोलाकार होता है। फल, मध्यम आकार के भार 125-250 ग्राम, रंग पीला, छिल्का पतला, रेशा रहित गूदा एवं गुठली छोटी होती है। फल अच्छी भंडारण क्षमता वाले होते हैं।
4. लंगड़ाः    
इसकी उत्पत्ति बनारस के समीप, गाँव में हुई । यह किस्म अंतिम मई से जुलाई के अंत तक फल देती है। वृक्ष फैलने वाली प्रकृति का एवं शीर्ष गोलाकार होता है। फल मध्यम आकार के अंडाकार, रंग हरा, रेशा रहित गूदा एवं छोटी गुठली होती है। फलों की भंडारण क्षमता कम होती है। इसका औसत उत्पादन 150-200 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष तक होता है।
5. सुन्दरजा:
यह मध्यम अवधि में पकने वाली किस्म है जिसका उत्पत्ति स्थान रीवा है। फल मध्यम आकार का, वजन 200-250 ग्राम, तिरछा, अंडाकार, रंग पीला, सुगंधित एवं स्वादिष्ट होता है। यह बंधा रोग (मैंगो मालफ़ॉर्मेशन) के लिये अत्याधिक संवदेनशील है।
6. गाजरिया:
यह बैतूल की प्रमुख किस्म है। फल मध्यम से बड़ा, आयताकार, आधार थोड़ा चपटा, शीर्ष गोलाकार, रंग पकने पर पीला-हरा, छिल्के पर सफेद धब्बे, छिल्का मध्यम से मोटा, गूदा रसदार एवं बहुत मीठा होता है। इसमें अनन्नास जैसी सुगंध होती है तथा गूदा गाजर के समान होने के कारण इसे गाजरिया कहते हैं । पकने का समय मध्य मई से अंतिम जून तक होता है।
7.  दहियड़:
यह भोपाल की रसदार किस्म है जिसका फल मध्यम आकार, तिरछा, अंडाकार, शीर्ष गोलाकार चैड़ा, रंग पकने पर पीला हरा छिल्का मोटा, गूदा रसदार, मीठा, हल्का पीला रेशा रहित होता है। दही में शक्कर मिश्रित सुगंध के कारण इसे दहियड़ कहते हैं।
8.  बॉम्बेग्रीन:
यह जल्दी पकने वाली किस्म है, जिसके फल मई के तीसरे सप्ताह में पक कर तैयार होते हैं। इस किस्म के वृक्ष अधिक शाखायुक्त एवं पत्तियाँ पतली होती हैं। फलों का आकार मध्यम, पकने पर हरे रंग से हरा-पीला, फलों में गूदे की मात्रा अधिक तथा स्वाद एवं मिठास अच्छी होती है।
 9. अलफैंज़ो:
यह रत्नागिरी (महाराष्ट्र) की लोकप्रिय किस्म है। फलों का आकार मध्यम, (वजन 250 ग्राम), गूदा नरम, रेशा रहित, रंग नारंगी, स्वाद खट्टा मीठा होता है। इसमें स्पंजी ऊतक नामक विकृति पायी जाती है। इसकी भंडारण क्षमता अच्छी होती है तथा निर्यात के लिये उपयुक्त है।
पौध रोपण:
आम के पौधों को 10 X 10 मीटर की दूरी पर लगायें । किंतु सघन बागवानी में इसे 2.5 से 4 मीटर की दूरी पर लगायें। पौधा लगाने के पूर्व खेत में  रेखांकन कर पौधों का स्थान सुनिश्चित कर लें। पौधे लगाने के लिये 1 X  1 X 1 मीटर आकार का गड्ढ़ा खोदें। वर्षा प्रारंभ होने के पूर्व, जून माह में 20 - 30 कि.ग्रा. गोबर की खाद, 2 कि.ग्रा. नीम की खली, 1 कि.ग्रा. हड्डी का चूरा अथवा सिंगल सुपर फॉस्फेट  एवं 100 ग्राम. मिथाईल पैरामिथियॉन की डस्ट (10 %) या 20 ग्राम थीमेट 10-जी को खेत की ऊपरी सतह की मिट्टी के साथ मिला कर गड्ढों को अच्छी तरह भर दें। दो-तीन बार बारिश होने के बाद जब मिट्टी दब जाये तब पूर्व चिन्हित स्थान पर खुरपी की सहायता से पौधे की पिंडी के आकार की जगह बनाकर पौधा लगायें। पौधा लगाने के बाद आस-पास की मिट्टी को अच्छी तरह दबाकर एक थाला बना दें एवं हल्की सिंचाई करें।

पौधे की देखरेख:  
आम के पौधे की देखरेख उसके समुचित फलन एवं पूर्ण उत्पादन हेतु आवश्यक है। पौधों को लगाने के बाद पौधों के पूर्ण रूप से स्थापित होने तक, सिंचाई करें। प्रारंभिक दो तीन वर्षों तक लू से बचाने के लिये सिंचाई करें। ज़मीन से 80 से.मी. की ऊँचाई तक की शाखाओं को निकाल दें, जिससे मुख्य तने का समुचित विकास हो सके। ग्राफ्टिंग के स्थान के नीचे से कोई शाखा नहीं निकलनी चाहिये। ऊपर की 3-4 शाखाओं को बढ़ने दें। बड़े छत्रक वाले घने वृक्षों में, न फलने वाली बीच की शाखाओं को काट दें। फलों को तोड़ने के बाद मंजर के साथ-साथ 2-3 से.मी. टहनियों को काट दें ताकि स्वस्थ्य शाखायें निकलें। अगले मौसम में अच्छा फलन होगा।
फल वृक्षों का पोषण:                    
            आम के पौधों में खाद एवं उर्वरक निम्नानुसार दें :
क्र.
वर्ष
गोबर की खाद (कि.ग्रा.)
नीम की खली (कि.गा.)
युरिया (ग्रा)
सिंगल सुपर फॉस्फेट (ग्रा.)
म्युरेट ऑफ पोटाश (ग्रा.)
  1.              
1 से 3
25
2
200
150
150
  2.            
4 से 10
40
3
900
800
600
  3.                 
10 वर्ष पश्चात्
75
3
2000
1500
800
नोट: उपरोक्त खाद एवं उर्वरक की मात्रा भूमि परीक्षण के पश्चात् परिणाम के अनुसार परिवर्तित करें।
सिंचाई एवं जल ग्रहण:  
आम का पौधा जब तक फलन में नहीं आता तब तक पौधों की उचित बढ़वार हेतु सर्दी के मौसम में 12-15 दिन एंव गर्मी के मौसम में 8-10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। मंजर या बौर आने के दो माह पूर्व से फल बनने तक पानी नहीं दें। यदि आम के साथ कोई अन्य फसल भी उगा रहे हैं तो सिंचाई आम के पौधों की आवश्यकतानुसार ही करें या फिर ऐसी फसल का चयन करें जिसमें  आम की सिंचाई के समय सिंचाई की आवश्यकता न हो। पौधों में फलन के समय पानी की अधिक आवश्यकता होती है, अतः मटर के दाने के आकार के आम के फल से तुड़ाई  तक सिंचाई करने से फलन एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है । सिंचाई हेतु टपक सिंचाई विधि (ड्रिप इरीगेशन) अपनायें।
पूरक पौधे एवं अंतराशस्य:     
आम के वृक्ष को पूर्णरूप से तैयार होने में लगभग 10-12 वर्ष का समय लगता है। अतः प्रारंभिक वर्षों में आम के पौधों के बीच, खाली पड़ी भूमि में अन्य फलदार पौधे, दलहनी फसल अथवा सब्जि़याँ लगायें एवं अतिरिक्त लाभ लें तथा भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ायें । पूरक पौधों के रूप में अमरूद, नींबू, अनार, पपीता, सीताफल (शरीफा) आदि फल के पौधे आम के पौधों के बीच लगायें । इस प्रकार एक हैक्टेयर भूमि में आम के 100 पौधे लगाये जा सकते हैं। अंतराशस्य के रूप में फ्रेंचबीन, चना, अरहर, मूँग, मेथी, भिंडी आदि फसलंे लगायें। थाले की भली भाँति गुड़ाई करें एवं समय पर खरपतवारों को नष्ट करें। पौधों के मध्य उत्पन्न खरपतवारों को ग्लाईफोसैट या अन्य खरपतवारनाशक रसायनों के प्रयोग करके समय-समय पर नष्ट करें।        
पुष्पन एवं फलन:
वानस्पतिक विधि से प्रवर्धित पौधों में 3-4 वर्षों में फूल आना प्रारंभ हो जाते हैं। आम में परागण कीटों द्वारा होता है। अतः फूल आने के समय कीटनाशक रसायनों का प्रयोग न करें अन्यथा फल उत्पादन प्रभावित होगा। पौधें में आयु के साथ फलन में वृद्धि होती है। साधारणतः 15-20 वर्ष के पौधे से अधिकतम फल प्राप्त होते हैं। औसत आकार के फल प्राप्त करने के लिये लगभग 30-40 प्रतिशत फलों को तोड़ दें।  
पौध संरक्षण
            पौध संरक्षण के अंतर्गत कीट तथा रोग नियंत्रण कर पौध सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।  यह इस प्रकार हैं –
कीट नियंत्रण                     
आम का फुदका (मैंगो हॉपर):  
इस कीड़े का प्रकोप फरवरी एवं मार्च महीने में होता है। वयस्क कीड़े हल्के भूरे रंग के होते हैं जिनके शरीर पर काली एंव पीली रेखायें होती हैं, सिर बड़ा तथा शरीर पीछे की ओर नुकीला होता है। कीट के शिशु की सफेद तथा लाल आँख होती है जो बाद में पीले रंग की हो जाती हैं। शिशु तथा वयस्क दोनों फूलों एवं पत्तियों का रस चूसते है। परिणामस्वरूप फूल एवं फल झड़ने लग जाते हैं। कीट, चिपचिपा रस उत्सर्जित करें जो पत्तियों पर फैल जाता है एवं काली फफूँदी उत्पन्न हो जाती है। जिससेे पौधे का प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है तथा पौधे कमज़ोर हो जाते हैं।
नियंत्रण:
इस कीट की रोकथाम के लिये फॉस्फोमिडॉन का 0.04 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।
आम का फुंगा (मिली बग):
कीट के बदन का रंग लाल, सिर, पंख, टाँगे तथा ऐंटिनी काले होते हैं। सिर छोटा, काला, बिना मुखांग वाला होता है। मादा कीट का शरीर कोमल, कुछ लालिमा लिये हुये हल्का भूरा होता है। जो मोम से ढक जाने के कारण सफेद दिखाई देता है। उदर में दस खंड स्पष्ट दिखाई देते हैं। कीट नवम्बर माह में सर्वप्रथम जड़ों के पास हज़ारों की संख्या में पाये जाते हैं। फरवरी माह में कीट के निम्फ नई टहनियों, बौर की मुजरियों से रस चूसते हैं जिससे फूल एवं फल झड़ते हैं।
 नियंत्रण:
कीट के नियंत्रण हेतु दिसम्बर-जनवरी माह में तने के चारों ओर गुड़ाई तथा क्लोरपायरीफाॅस या मिथाईल पैराथियॉन  के 200 ग्राम चूर्ण का भुरकाव करें अथवा पाॅलीथिन की चादर से तने पर 20 से.मी. की पट्टी एवं ग्रीस लगाने से भी कीट का नियंत्रण किया जा सकता है।
दीमक:
दीमक के प्रकोप से तने पर मिट्टी की एक पर्त चढ़ जाती है। कीट, पौधे की छाल एवं अन्य भागों को खाता है।
नियंत्रण:
इसके नियंत्रण हेतु थीमेट (10 जी) 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर या मिथाईल पैराथियॉन  (10 प्रतिशत) 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर भूमि में मिला कर इसका नियंत्रण करें। नियमित सिंचाई भी इसके नियंत्रण में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
रोग नियंत्रण
कालव्रण (एन्थे्रक्नोज़):
इस बीमारी का प्रकोप नई पत्तियों, टहनियों, फूलों और फलों पर होता है। शुरू में छोटे भूरे धब्बे बनते हैं और बाद में आपस में मिलकर बड़े-बड़े गोल भूरे धब्बे बनाते हैं। भंडारण के समय फलों पर गोल, भूरे धब्बे पड़ जाते हैं जो बाद में काले भूरे रंग के हो जाते हैं।
 नियंत्रण:
मानेब 2 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। ब्लाईटॉक्स 3 ग्राम/लीटर पानी में  घोलकर छिड़काव करने से भी रोग पर काबू पा सकते हैं। फलों को बेनलेट या कार्बैंडाज़िम के घोल में  डुबाकर भंडारण करने से भी रोग को रोका जा सकता है।
बंचीटाप (मैंगो मैलफार्मेशन):
इस रोग में मंजरी एक गुच्छे के रूप में परिवर्तित हो जाती है जो अधिक कड़े एवं हरे होते हैं इसमें सिर्फ नर फूल ही होते हैं। जिसके कारण इसमें फल नहीं लगते। नियंत्रण हेतु अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में गुच्छों की कटाई कर प्लैनोफिक्स 200 पी.पी.एम. का छिड़काव करें।
कोलसी (सूटी मोल्ड):
यह रोग कीड़ो द्वारा निकाले हुये चिपचिपे मीठे पदार्थ के कारण फैलता जा रहा है। इस चिपचिपे पदार्थ पर काली फफूँद की पपड़ी सी बन जाती है। यह काली फफूँद टहनियों को भी ढक लेता है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया रूकने के कारण पौधों का विकास रूक जाता है।
नियंत्रण हेतु वेटासुल (0.2 प्रतिशत), मैटासिड (0.1 प्रतिशत), गम-एकेसिया (0.3 प्रतिशत) के छिड़काव कर रोग को प्रभावी ढंग से रोकें। डायमिथियोएट अथवा मिथाईल डेमेटॉन कीटनाशी का 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें जिससे भुनगे, हॉपर और अन्य कीट नियंत्रित हो जायें। काली पपड़ी हटाने के लिये 2 ग्राम घुलनशील स्टार्च प्रति लीटर पानी में घोल कर पत्तियों पर छिड़काव करें।      
तुड़ाई  एंव भंडारण:    
आम किस्म के अनुसार, 85-105 दिनांे में  पकते हैं। फलों को काटने पर गूदे का रंग हल्का पीला हो तो फल को पका हुआ समझें। आम के पके फलों की तुड़ाई  सुबह के समय इस प्रकार करें ताकि फलों को चोट एवं खरोंच न आये, चोटिल फलों पर फफूँद के प्रकोप से सड़न पैदा हो जाती है। जिससे आर्थिक हानि होती है फलों को तुड़ाई  के बाद छायादार स्थानों में रखें। अगर प्रशीतन की सुविधा हो तो इन फलों को प्रशीतित करें जिससे फलों की भंडारण क्षमता बढ़ जाती है। यह सुविधा उपलब्ध न होने पर फलों को ठंडे पानी में धोकर हवादार एवं छाया वाले स्थान में सुखा लें।       
            आम के फलों का श्रेणीकरण फलों के आकार, किस्म, वजन, रंग व परिपक्वता के आधार पर करें। फलों को सुरक्षित भंडारण, परिवहन तथा विपणन के लिये पैक करना अति आवश्यक है। भारत में अधिकतर फल बाँस, अरहर, शहतूत, फालसा आदि की लकडि़यों की बनी टोकरियों में पैक किये जाते हैं। आजकल कार्डबोर्ड एंव फाईबर के भी बक्से पैकिंग के लिये उपलब्ध हैं। पेटीबंदी के लिये फलों के बीच में सूखी मुलायम घास, पेड़ के पत्ते, कागज़ की कतरन, धान का पुआल आदि का अस्तर के रूप में प्रयोग करें।
            फलों की लम्बे समय तक उपलब्धता एवं गुणवत्ता बनाये रखने के लिये सुरक्षित भंडारण आवश्यक है। साधारणतः पके हरे आम को कमरे के तापमान पर किस्मानुसार 4-8 दिन तक सुरक्षित भंडारण किया जा सकता है। भंडारण की निम्नलिखित विधियाँ हैं:
1.         पूर्ण शीतलन -आम के फलों को ठंडे पानी में 30 मिनट तक रखें जिससे फलों का तापमान कम हो जाये एवं भंडारण अवधि बढ़ जाये।
2.         शीतलन -फलों पर 2 प्रतिशत कैल्शियम नाईटेªट के घोल का छिड़काव करें ताकि फलों की भंडारण क्षमता बढ़ जाये। यह छिड़काव, तुड़ाई  पूर्व 7 दिन के अंतराल से तीन बार करें।
3.         शीत भंडारण -इस विधि में 7 डिग्री सेल्सियस से 9.5 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा 85 -90 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता पर अलग-अलग किस्मों को 3 सप्ताह से चार सप्ताह तक भंडारित किया जा सकता है। कच्चे आम के फलों को कम तापमान (7 डिग्री सेल्सियस) पर अधिक दिनों तक रखने से फल ठीक से पक नहीं पाते हैं किंतु पूर्ण रूप से पके फलों को 8-10 डिग्री सेल्सियस पर 2-3 सप्ताह तक सुरक्षित भंडारित किया जा सकता है।
विपणन:
आम के बाग सामान्यतः अधिकृत ठेकेदारों को नीलाम कर दिये जाते हैं, जिसके कारण बाग की देखभाल ठीक तरह से नहीं हो पाती है एवं फलों की तुड़ाई अधपकी अथवा बिना पकी अवस्था में करने के कारण गुणवत्ता भी प्रभावित होती है अतः यदि आम का विपणन सहकारी समितियों के माध्यम से किया जाये तो आम उत्पादकों को उनके उत्पादन का उचित मूल्य मिल सकता है।